कानपुर की नूर बेगम

यह बात पिछले साल की है. चूंकि अब मैं कानपुर शिफ्ट हो गया हूँ, इसलिए कानपुर की नूर बेगम के नाम से ये कहानी लिख रहा हूँ.

एक दिन मुझे किसी काम से लखनऊ जाना था तो मैं घर के पास से स्टेशन जाने के लिए एक टेम्पो में बैठा. शाम हो चुकी थी, टेम्पो में तीन चार लोग बैठे थे. मेरी बगल वाली सीट पे एक बुर्के में महिला बैठी थी. पहले मैंने गौर नहीं किया, फिर मैंने देखा कि वो मेरी तरफ देख रही है. उसकी आंखें बहुत सुन्दर लग रही थीं, तो मैं भी देखने लगा. मैं अपना मोबाइल लेकर बार बार उसकी तरफ दिखाने लगा. थोड़ी देर में उसने अपना बुर्का हटा दिया. वो 32-33 साल की पतली कमर और मस्त फिगर वाली माल किस्म की चीज थी. उसके चेहरे से नूर छलक रहा था. मैं उसको देखता ही रह गया. वो बाजू में बैठी अपनी सहेली से अपनी बेटी के बारे में बात कर रही थी. कुछ देर बाद उसकी सहेली उतर गयी.

थोड़ी देर बाद वो मेरी तरफ देख कर मुस्कराई, फिर अपना मोबाइल मुझे देते हुए बोली- देखो, ये ठीक से चल नहीं रहा है.
मैंने मोबाइल लेकर अपना नम्बर डायल कर दिया. कॉल की, लेकिन फ़ोन नहीं लगा. फिर मैंने अपना कार्ड भी उसको दे दिया और वो टेम्पो से उतर गयी.

मैं स्टेशन पहुंच कर लखनऊ चला गया. मैं उसके फ़ोन का वेट करता रहा, लेकिन उसकी कॉल नहीं आयी, तो मुझे बहुत दुःख हुआ कि मैं उसका नम्बर नहीं ले पाया.

अगले दिन मैं वापस कानपुर आ रहा था कि एक अंजान नम्बर से कॉल आया. उधर से कोई लड़की बोल रही थी, ये वही थी, उससे बात करके अच्छा लगा.
मैंने पूछा- कल फ़ोन क्यों नहीं किया?
तो बोली- बैलेंस खत्म हो गया था.
उसकी बात सुनकर मैंने उससे बोला कि तुम काटो, मैं फ़ोन करता हूँ.

फिर हमारी बात हुई. मैंने बताया कि मैं लखनऊ से वापस आ रहा हूँ.
मैंने मिलने के लिए बोला, तो बोली- शाम को मिलते हैं.

शाम को मिलने पहुंचा तो वो जिस ऑफिस में काम करती थी, उधर से वापस आयी हुई थी. मैंने उसे अपनी बाइक पे बिठाया. उसने बुर्का पहन रखा था, तो वो बेफिक्र मेरे कंधे पर हाथ रख कर बैठ गयी. हमारी खूब बातें हुईं. हम दोनों ने एक दूसरे के बारे में जाना. उसने अपना नाम नूर बताया. उसका तलाक हो चुका था. उसके एक छह साल की एक बेटी थी और वो अपनी मम्मी के साथ रहती थी. दिन में एक ऑफिस में काम करती थी और अपनी जिंदगी जी रही थी.

मैंने उसे उसके घर के पास छोड़ दिया. फिर हमारी रोज बात होने लगी. आने वाले संडे को हम दोनों ने मिलने का प्लान बनाया. हम लोग मूवी देखने गए. कार्नर की सीट पर हम बैठे थे. उसमें कपल ही ज्यादा थे, मैंने उसका हाथ पकड़ा तो उसने अपना सर मेरे सीने पर रख दिया. मैं उसके सर पर हाथ फेर रहा था. धीरे धीरे मैंने उसके कंधे को पकड़ कर उसे अपने सीने से लगा लिया. फिर उसका चेहरा ऊपर किया तो उसने अपनी आंखें बंद कर लीं.

मैंने उसकी आँखों पे किस किया, तो वो आंखें खोल कर मेरी तरफ देखने लगी.

पता नहीं मुझे क्या हुआ, मैंने अपने होंठ उसके होंठ से जोड़ दिए, उसने आंखें बंद कर लीं. हमारे होंठ आपस में यूं जुड़ गए, जैसे हम दोनों जन्मों के प्यासे हों. हम एक दूसरे के होंठ चूसने लगे. उसकी सांसें तेज होने लगीं, मैंने अपना एक हाथ उसके सीने पर रख दिया और कुरते के ऊपर से ही उसके मम्मों को दबाने लगा. वो मस्ती से आंखें बंद किये हुए मजे ले रही थी.

करीब दस मिनट तक हम एक दूसरे के होंठ चूसते रहे. मेरा लंड खड़ा हो चुका था. मैंने उसका हाथ पकड़ कर अपने लंड के ऊपर रखा और वो पेंट के ऊपर से मेरा लंड सहलाने लगी. हम दोनों अलग ही दुनिया में पहुंच गए थे. पूरे दो घंटे हम एक दूसरे के जिस्मों से खेलते रहे. मैंने उसकी चूत में उंगली की, उसने मेरे लंड का पानी निकाला.

फिर वो बोली- अगली बार कहीं और मिलेंगे.

मैंने हां बोल कर उसे उसके घर के पास छोड़ दिया. फिर उसी शाम को मेरी बीवी अपने मायके से वापस आ गयी, तो उस रात मैंने अपनी बीवी को नूर समझ कर चार बार चोदा.
बीवी बोली- क्या बात है आज तो थक ही नहीं रहे तुम?
मैंने बहाना बना दिया कि इतने दिनों से प्यासा था.. आज मजा आ गया.

फिर मैंने नूर से अगले हफ्ते अपने खास दोस्त के घर पर मिलने का प्लान बनाया. उसकी बीवी भी मायके गयी हुई थी. वो अपनी दुकान पर था.

मैंने नूर को उधर ही बुला लिया, फिर उसके साथ दोस्त के घर गया. मैंने पहले ही रास्ते से एक कंडोम का पैकेट और तीन बियर ले ली थीं. हम दोनों दोस्त के घर पहुंच गए. मेरे दोस्त ने हम दोनों को अन्दर किया, फिर दस मिनट में वो अपनी दुकान पर चला गया. उसके जाते ही मैंने घर को बाहर से लॉक कर दिया और पीछे के रास्ते से अन्दर आ गया.

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