मालिक की बेटी की कामवासना

दोस्तो नमस्कार, मेरा नाम संजय शर्मा है, आजकल दिल्ली में रहता हूँ, अच्छी नौकरी करता हूँ. आज पहली बार आपसे अपने कुछ अनुभव साझा करूँगा, अगर आपको पसंद आए तो आगे भी अपने और दोस्तों की लाइफ के अनुभव आपको हाजिर करूँगा.

कुछ दिन पहले ग्रेटर कैलाश मार्केट में मेरा बचपन का दोस्त सतीश मिला, बिल्कुल बदला हुआ, चश्मा लगा कर, मस्त मोटरसाइकल पर सवार, पूरा छह फुट का कद, पहलवानी, कसरती बदन. मैंने उसे देखते ही पहचाना, तो आवाज़ देकर उसे रोका.

दसवीं क्लास में हम दोनों साथ पढ़ाई करते थे. वो साला निरा निकम्मा था, मुश्किल से पास होता था.

स्कूल के बाद वो कल ही मिला. मैंने उसका हाल चाल पूछा तो मैं तो दंग रह गया. उसकी कहानी उसने कुछ इस तरह बताई.

बारहवीं क्लास के बाद चाचा ने मुझे दिल्ली बुला लिया और साकेत में एक बड़े सेठ जी के यहाँ ड्राइवर की नौकरी में लगवा दिया. घर में सेठ जी, सेठानी जी, उनकी एकलौती लड़की (अनु दीदी) और सेठ जी की कुँवारी बहन, जो करीब 28 साल की थी, उसे मैं भी बुआ जी ही कहता हूँ. अनु दीदी कॉलेज में पढ़ती थी, वो करीब बीस या इक्कीस साल की थी. सेठ जी की दो फैक्ट्री हैं.. दोनों ही ओखला में हैं. मेरा काम सेठ जी को ऑफिस में छोड़कर, घर पर चले जाना था और इसके बाद मैं घर पर शाम तक रहता था.

शाम को सेठ जी को फैक्ट्री से ले आता था. सेठ जी ने कोठी के पीछे ही मुझे क्वॉर्टर भी दे दिया था. बोलचाल में ठीक होने और साफ सुथरा रहने की वजह से सब मुझे पसंद करने लगे थे. सेठानी जी, अनु दीदी या बुआ जी को कहीं जाना होता था, तो मुझे ही कहते थे. हालांकि घर में दो गाड़ियां और भी थीं.

इधर काम करते हुए मुझे लगभग दो साल हो गए थे और मैं घर के मेंबर जैसा ही हो गया था.

एक दिन मैं अनु दीदी की ड्यूटी पे था, ग्रेटर कैलाश की मार्केट में अनु दीदी और उनका एक दोस्त किसी रेस्तरां में कॉफी पी रहे थे. मैं बाहर गाड़ी के पास था, लेकिन शीशे में से उन दोनों को देख सकता था.

अचानक उस लड़के ने अनु दीदी को थप्पड़ मारा, ये मुझे बहुत बुरा लगा. मैं अन्दर गया और उसे नीचे पटक दिया और बहुत मारा.
अनु दीदी मना करती रहीं, लेकिन मैं रुका नहीं.

बाद में कार में अनु दीदी रोने लगीं, मुझे लगा शायद मेरी एक हरकत पे गुस्सा हैं.
मैंने पूछा तो उन्होंने कुछ नहीं बताया. काफ़ी बार पूछने के बाद, उनको विश्वास हुआ कि मैं किसी को कुछ नहीं कहूँगा तो उन्होंने बताया कि वो उस लड़के से प्रेगनेन्ट हैं. मुझे बड़ा अजीब लगा कि सिर्फ़ उन्नीस साल की उम्र में अनु दीदी लंड का सुख पा गईं और मैं 23 साल को होने के बाद भी कुँवारा ही हूँ.

उस दिन से मेरा नज़रिया बदलने लगा. वो बहुत रो रही थीं, तो मैंने कहा कि मैं कुछ नहीं होने दूँगा, आप परेशान ना हों. बस घर में दो दिन का कॉलेज टूर बना लो और मेरे साथ चलो, मैं आपका पेट साफ़ करवा दूँगा, सब ठीक हो जाएगा.

उसने ऐसा ही किया और मुझे भी साथ जाने की पर्मिशन ले ली. मैंने अपने दोस्त की मदद से उसका गर्भपात करवाया और दो दिन में सब ठीक हो गया.

कहते है ना कि जिसने लंड का मज़ा ले लिया हो, वो कैसे रुके.

एक दिन मार्केट जाते हुए वो पीछे की बजाए आगे बैठ गयी और मुझसे बात करने लगी कि मैंने उसकी जिंदगी बचा ली है.. वरना वो तो बर्बाद हो जाती.
मैं कुछ नहीं बोला.

उसने मुझसे पूछा कि क्या तेरी कोई गर्लफ्रेंड है?
मैंने कहा- कहाँ दीदी, मुझे इतने बड़े शहर में कौन पसंद करेगा.
तो उसने कहा- ऐसी बात नहीं है, तुम हट्टे कट्टे खासे मर्द दिखते हो, अच्छा पहनते हो, अच्छा बोलते हो.. कोई नहीं बता सकता कि ड्राइवर हो.

मौका देखकर मैंने बात छेड़ी- दीदी, इन आवारा लड़कों के चक्कर में आपको नहीं पड़ना चाहिए, सब मज़ा लेते है बस.. कोई साथ नहीं देता. आप सुंदर हो, पैसा है आपके पास, आपके पापा आपकी शादी बड़ी धूमधाम से करेंगे.
उसने हंस कर कहा- अरे सतीश, शादी तो मैं पापा की मर्ज़ी से ही करूँगी, वो तो बस टाइम पास था.

मैंने कहा- तो कम से कम आपको टाइम पास तो अच्छा रखना चाहिए ना, जो आपकी इज़्ज़त करे, ऐसे मारे तो नहीं. जब तक रहें, मस्त रहें, उसके बाद आप शादी करवा लो, बात खत्म.. सब कुछ सेफ.
उसने कहा- बात तो तुम्हारी सही है, ऐसा ही होना चाहिए, अबकी बार ऐसा ही करूँगी.
इतना कह कर वो हँस दी.

एक दिन मॉल में गए हुए थे तो उसने साथ में शॉप में चलने को कहा, मैं भी चला गया. उसने कोई ड्रेस पसंद की और मुझे पहन कर दिखाई. मस्त ड्रेस थी, वो बहुत प्यारी लग रही थी.
उसने मुझे भी एक शर्ट दिलवाई.

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