हमने नया गाँव बसा लिया

इतनी बड़ी हथियारबंद टुकड़ी देख कर हम लोगों की गांड फट कर फव्वारा बन गयी। हम लोगों के पास इरादा त्यागने के अलावा कोई चारा नहीं था।

फिर मैंने हिम्मत करके अपने साथियों से कहा कि इस टुकड़ी का सामने से लड़कर जीतना बहुत मुश्किल है. क्यों न इनका चुपचाप पीछा किया जाये और मौका मिलते ही अपना काम बना लिया जाये?
तो हम लोगों ने चुपके से उनका पीछा करना शुरू कर दिया. करीब 25 मील चलने के बाद वो लोग रुक गये, शाम होने वाली थी तो उन्होंने कैम्प लगाना शुरू कर दिया।

कैम्प लगा कर हिंदुस्तानी सैनिकों ने रात का खाना बनाने का इंतजाम शुरू कर दिया।

जंगल में अंधेरा जल्दी हो जाता है, तो भी उनको काम खतम करते करते रात के आठ बजे गये।

लगभग दो घण्टे तक उनकी आवाजें आती रहीं, उसके बाद वो सब अपने अपने टेंट में सोने चले गये, केवल दो हिंदुस्तानी सैनिक तलवार लेकर पहरा दे रहे थे।
हम लोग रात गहराने की प्रतीक्षा कर रहे थे, सर्दी की रात में हम लोगों के लण्ड भी सिकुड़ के मूंगफली बन रहे थे।

तकरीबन बारह बजे के आस पास उन दोनों पहरोदारों को भी नींद आने लगी, क्योंकि वो गर्म कम्बल ओढ़े हुये थे. खाने में उन्होंने गोश्त खाया था और शराब भी पी हुई थी।

हम लोग भी चुपके से उनके रसद वाले टेंट में घुस गये और बचा हुआ खाना व थोड़ी थोड़ी शराब भी पी गये।

फिर देखा कि उनके पहरेदार मस्त सोये पड़े थे।
हमने उनके सारे घोड़ों को खोल लिया यानि दो घोड़े टेंट के सामान वाली गाड़ी वाले और सात घोड़े, जिनमें अंग्रेज सवार थे।

खजाने वाले घोड़े हमने खजाने वाली गाड़ी में जोत दिये। और रसद सामग्री वाली गाड़ी के घोड़े उसमें जोत दिये।

अब हम 15 लोग 9 घोड़ों पर आसानी से भाग सकते थे, पर हम दो लोग खजाने वाली गाड़ी में बैठ गये, दो लोग रसद वाली गाड़ी में बैठ गये। हम लोगों ने उनके हथियार वाले टेंट से सारी बंदूकें और लगभग बीस तलवारें भी बटोर लीं।

फिर हम बिना शोर किये, धीमे से खजाना ले उड़े और करीब सारी रात ही हम कानपुर की तरफ भागे।

लगभग सात बजे सब ठीक ठाक रोशनी हुई, तब जाकर हमने सांस ली।

अब सोचा गया कि अपने खजाने की शक्ल तो देख लें. हमारा अनुमान था, कि कम से कम पचास हजार की रकम हाथ लगी होगी. तो हमने उस घोड़ागाड़ी का ताला पत्थर से तोड़ने का प्रयास करने लगे, मगर अंदर से अजीब सी कुलबुलाहट की धीमी आवाजे आ रहीं थी।

तो हम लोग डर गये कि कहीं खजाने के अंदर कोई सैनिक न हो।

हम लोगों ने फिर चुराई हुई राइफलें अपने हाथ में लीं, और तेज आवाज़ में कहा जो भी अंदर हो वो हाथ उठा कर बाहर आ जाये, हमने तुम्हे चारों ओर से घेर लिया है।
पहले तो कोई हलचल नहीं हुई तो हमने दरवाजे पर एक लात जमा कर, दुबारा धमकी दी, तब दरवाजा धीरे धीरे से खुलने लगा।
कसम से जब दरवाजा खुला तो हम सब भौचक्के रह गये, क्योंकि हम लोगों की किस्मत का खज़ाना नज़र आने लगा।

जैसे ही दरवाजा खुला, हम लोगों की आंखों के साथ साथ गांड भी फट गई, क्योंकि उसके अंदर लगभग 24 सुंदर कमसिन जवान परियाँ थीं, जिनके होंठ सुर्ख गुलाबी थे, और सभी लगभग 5 फुट 2 इंच से लेकर 5 फुट 5 इंच तक की थी.

सबकी चूचियां गोल गोल संतरे जैसी थी, उनके चूचक उभार लिये हुये थे। उनके चूतड़ बिल्कुल गदराये हुए थे। कुल मिला कर वो बहुत ही बढ़िया चुदने का सामान थीं। कोई शरीफ आदमी उनको देख लेता तो फौरन अपना लण्ड हाथ में लेकर मुठ मारने लग जाता।
हम लोग भी पूरे शरीफ थे।

अंदर इनके अलावा लोहे का बक्सा भी था। उसमें दस हजार सोने के सिक्के थे।

फिर हमने उनसे पूछताछ की.
तब उन्होंने बताया कि उन्हें कानपुर के अलग अलग गांवों से उठाया गया है और उनको वायसराय के मनोरंजन के लिये ले जाया जा रहा है।

जिस पड़ाव पर वो लोग कैम्प लगाए थे, वहाँ उन अंग्रेजों ने खिड़की से खाना भी खाने को दिया था, जिसे हम लोग अंधेरे की वजह से देख नहीं पाये थे।

अब हम लोग सारे घोड़े तो खोल लाये थे, इतनी दूर भाग भी आये थे तो हाल फिलहाल में उन अंग्रेजों का तो डर उस समय नहीं था।

और अंग्रेजों का कोई बड़ा नुकसान भी नहीं हुआ था, वो तो किसी भी गांव से फिर लड़कियाँ उठा सकते थे। लेकिन उनके हथियार हम ले आये थे, उसके लिये उनकी माँ जरूर मर रही होगी।

खैर हमारे सामने समस्या खड़ी हो गयी थी कि इस खजाने का क्या किया जाये। इन्हें घर छोड़ने जायेंगे, तो इनके घरवाले इन्हें स्वीकार नहीं करेंगे, क्योंकि अंग्रेज जिसको ले जाते हैं, उन्हें बिना चोदे छोड़ते नहीं हैं।

अब जंगल में भी इनको छोड़ा नहीं जा सकता था, कोई अन्य गाँव वाला भी इन्हें इसी कारण न स्वीकार करता।
तो हमने उन खूबसूरत काम बालाओं से ही पूछ लिया- तुम क्या चाहती हो?

Pages: 1 2 3 4