मेरी पहली चुदाई चाचा की लड़की के साथ

मैं उसकी तरफ मुड़ा अपने हाथ से उसका कमीज ऊपर किया, फिर ब्रा के ऊपर से थोड़े उसके चुचे मसले. वो गुस्से में मेरी तरफ देखे जा रही थी. तब मैंने उसकी ब्रा भी ऊपर कर दी और मुझसे जब नहीं रुका गया … तब मैंने अपने दोनों हाथों से उसके बड़े बड़े और सख्त चुचे पकड़ लिए और उनको जोर से दबा दिया. इससे कविता की चीख निकल गई.

मैंने उसको बेड पर बिठाया और खुद भी उसके पास बैठ कर उसके चुचों को मसलता रहा. मैंने कविता का चेहरा देखा. तो उसकी आँखें मस्ती से बंद थीं और चेहरे पर खुशी दिखाई दे रही थी. वक़्त का फायदा उठा कर मैंने उसकी एक चूची को अपने मुँह में ले लिया और उसको जोर जोर से चूसने लगा. मुझे मजा आ रहा था. मैं उसकी चूची को ऐसे चूसने लगा, जैसे में दशहरी आम चूस रहा होऊं. मैं बारी बारी से दोनों चुचियों को चूसता रहा. उसने भी अपने आप को मेरे हवाले कर दिया था.

फिर मेरा एक हाथ उसकी जांघों के बीच घूमने लगा. कविता ने अपनी टागें सिकोड़ लीं और बोली- चिराग रो रहा है.
तब मेरा ध्यान चिराग पर गया, जो रो रहा था.
मैंने कहा- ठीक है.

मैं उसके ऊपर से उठ कर बेबी को उठा कर जाने लगा. फिर मैंने गेट पर जाकर कहा- अभी नहीं सीखी हो दूध पिलाना तो चिराग को घर देकर वापस आकर सिखा दूँ?
कविता खड़ी खड़ी थोड़ी मुस्कुराई, तो मैं उसकी चुदास समझ गया.

मैं उसको आँख मार कर जल्दी से घर आ गया. मैंने जल्दी से चिराग को भाभी को दिया और जल्दी से चाचा के घर आ गया. मैंने वापस आकर देखा कविता उसी बेड पर बैठी थी. मैंने उसके पास जाकर थोड़ा डरते हुए उसके कंधे पर हाथ रखा. जब उसने कोई आपत्ति नहीं जताई, तब मेरा हौसला बढ़ा और पीछे से ही मैंने उसके सूट में हाथ हाथ डाल कर उसकी चूची पकड़ ली.

फिर आगे जाकर उसको बेड पर लिटाया और उसका शर्ट उतार कर ब्रा भी निकाल दी अब उसकी चुचियों को खूब मसला और खूब दबा दबा कर चुसाई का मजा लिया. फिर एक हाथ से मैंने उसकी सलवार का नाड़ा खोला और सलवार नीचे कर दी. उसने काली कच्छी पहनी थी. वो इतनी मस्त लग रही थी कि मेरा मन हुआ कि लंड को कच्छी में से ही पेल कर उसकी चुत में डाल दूँ.

मैंने अपने होंठ उसके होंठों पर रखे और किस करने लगा. देखते देखते वो भी मुझको किस करने लगी. मुझको उसकी तरफ से हरी झंडी मिलने के बाद मैं उठा और उसके पैरों के पास जाकर उसकी कच्छी उतार दी.

भाईयो, मैं अपनी बहन की चुत को देखता ही रह गया. उसकी चूत पर एक भी बाल नहीं था …एकदम गोरी चूत मेरी आँखों के सामने चुदने को पड़ी थी. मैंने अपनी उंगली चुत की गोरी फांकों के बीच में डाली, जो अन्दर से गुलाबी थी.
मुझसे रुका नहीं गया और मैंने अपना लोवर बिना वक़्त गंवाए उतारा और कविता के ऊपर चढ़ कर उसे किस करने लगा. साथ ही मैं अपने लंड का दवाब उसकी नंगी चुत पर डालने लगा और ऊपर नीचे होने लगा.

खुद ब खुद मेरी बहन के हाथ मेरी कमर पर आ गए. उसने धीरे से मेरे कान में कहा- रवि, अब कुछ करो प्लीज.
मैं जोर जोर से ऊपर नीचे होकर झटके मारने लगा. ये सब बिना लंड चुत में डाले ही कर रहा था.

कविता से रुका नहीं गया और उसने खुद मेरा लंड पकड़ा और चुत पर लगा कर मुझको कहा- अब नीचे होकर पेल दे.
मैं जैसे ही नीचे हुआ, मेरा लंड चूत की दरार में एक इंच ही गया होगा कि वो बोली- रुको.
मैं रुका तो कविता बोली- दर्द हो रहा है … रहने देते हैं.
मैंने सोच समझ कर कहा- इसमें दर्द होता है … पीछे वाले में नहीं होगा.
उसके मुँह से निकल गया- तू भी …!
मैंने पूछा- क्या तू भी?
वो धीरे से बोली- मेरा मतलब तू भी मानेगा नहीं …
मैं हंस दिया और कहा- आज मजा लेने का मन है.

वो ये सुन कर चुप रही, मैंने उसे उठाया और बेड से उतर कर बेड पर हाथ रखवा कर कविता को घोड़ी बना दिया. ऐसा मैंने इसलिए किया … क्योंकि मुझको उसकी गांड ज्यादा पसन्द थी. अब उसकी गोरी और मोटी जबरदस्त गांड मेरे सामने थी. अपने मुँह से थूक लेकर उसके गांड के होल पर लगाया और उंगली से होल थोड़ा ढीला किया.

उसकी कामुक सिसकारियां निकल रही थीं.

मैंने अपने लंड पर भी थूक लगाया और गांड के छेद के निशाने पर रखा. अपने हाथ से उसके चूतड़ों को पकड़ा ताकि वो आगे को ना भागे. फिर निशाना साध कर एक जोर का झटका मारा तो मेरा आधा लंड कविता की गांड में घुस गया था.
वो दर्द से चीखी- आआहह … निकालो रवि … प्लीज रुका आआह … रवि फट जाएगी रुको … बस अब नहीं होगा मुझसे ये.
मैंने कहा- बस अब दर्द नहीं होगा, मैं रुक गया हूं.

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