ऐसे बना चंद्रप्रकाश से चंदा रानी

सेक्स सम्बन्धी कहानी के लिए अन्तर्वासना मेरी प्रिय वेबसाइट है. जैसे मैं रोज खाना खाता हूँ. रोज सांस लेता हूँ. रोज नहाता हूँ ना वैसे ही रोज अन्तर्वासना को विजिट करता हूँ. घंटे दो घंटे का समय बड़े ही आनन्द के साथ बीत जाता है. आज सोचा कि अपनी कहानियाँ भी मैं आपसे साझा करूं. यदि मेरे जीवन से सम्बन्धित सभी कहानियाँ लिखूं तो कोई पांच सौ कहानियां तो ही ही जायेंगी.
यह पहली कहानी है.

मेरे माँ बाप ने मेरा नाम चंद्रप्रकाश रखा. एक कस्बे का रहने वाला था. हायर सेकेंडरी के बाद भोपाल पढ़ने के लिए गया. एक बड़े सरकारी कॉलेज में मैंने बी.ए. में एडमिशन ले लिया. भोपाल बहुत बड़ा शहर है. बड़ी बड़ी इमारतें हैं, खूब मोटर गाड़ियाँ चलती हैं, कई सिनेमाघर हैं.
मेरे जीवन की पहली घटना वहीं हुई, जिसने मेरे अंदर छिपी हुई लड़की को बाहर निकाल दिया.

वो रविवार का दिन था और जुली सिनेमा हाल में बहुत भीड़ थी. अमिताभ बच्चन जी की एक प्रसिद्ध फिल्म लावारिस लगी हुई थी. टिकट लेने वालों की लाइन बहुत लम्बी थी. मैं भी लाइन में लग गया.
दस मिनट बाद ही टिकट खिड़की बंद हो गई तो मैं निराश हो गया. मैं सिनेमा परिसर में बनी हुई चाय की गुमटी के बाहर खड़े होकर चाय पीने लगा.

उसी समय वहां कोई चालीस साल के एक अंकल आये और मुझसे बात करने लगे- स्कूल में पढ़ते हो बेटा?
मैं- नहीं अंकल, कॉलेज में पढ़ता हूँ.
अंकल- फिल्म देखने आये हो? टिकिट मिल गयी?
मैं- टिकेट नहीं मिली अंकल जी, मेरा तो पूरा मूड खराब हो गया, लेकिन अब अगले शो में कोशिश करूंगा.
अंकल- अगर तुम्हें इसी शो का टिकिट मिल जाए तो?
मैं- तो मजा आ जायेगा अंकल!

अंकल ने अपने जेब से दो टिकिट निकाली और मेरे सामने कर दी और बात आगे बढ़ाई- मेरे पास दो टिकिट हैं. मैं दिखा सकता हूँ तुम्हें यह फिल्म.
मैं- अरे वाह !! मजा आ जाएगा. बताओ अंकल, कितने रूपये में दोगे टिकिट?
अंकल- फ्री में दूंगा. कितनी उम्र है तुम्हारी?
मैं- अठारह साल.
अंकल- नाम?
मैं- चंद्रप्रकाश.

अंकल मुझे ध्यान से देखने लगे. लगभग पांच फीट हाईट थी मेरी. रंग एकदम गोरा था. चेहरा भरा हुआ. आँखें बड़ी बड़ी. गोल गोल गाल. मैं न ज्यादा दुबला और न ही ज्यादा मोटा था. छोटे कस्बे का रहने वाला था. सीना थोड़ा उभरा हुआ था. ढीला पैन्ट और रंगीन शर्ट पहनी थी जिस पर बड़े बड़े फूल बने हुए थे. शर्टिंग की हुई थी. पीठ से नीचे का भाग उभरा हुआ था.

फिर उन्होंने अपने शर्ट को ऊँचा किया और पैन्ट की चेन वाले स्थान पर अपना हाथ रखकर बोले- चलो बेटा, तुम भी क्या याद रखोगे? मैं दिखता हूँ तुम्हें फिल्म.
उन्होंने मेरा हाथ थाम लिया और यह कहते हुए वाशरूम की तरफ ले गये कि चलो आते हैं.

वाशरूम में तीस से अधिक कम्पार्टमेंट बने थे, सभी फुल थे. हम खड़े होकर प्रतीक्षा करने लगे. एक आदमी हटा तो मैंने अंकल को जाने का इशारा किया. अंकल नहीं गये. जब एक साथ दो कम्पार्टमेंट खाली हुए थे मेरा हाथ पकड़कर अंकल आगे बढ़े. मुझे आवश्यकता नहीं थी. मगर मैं भी उनके साथ चला गया. मैं खुश था कि मुझे फिल्म देखने को मिल रही है.

अंकल के सीधे हाथ में मेरा उल्टा हाथ था, उसको छोड़े बिना उन्होंने उलटे हाथ से अपने पैन्ट की चेन खोली और पेशाब करने लगे. मुझे लगी तो नहीं थी मगर मैंने भी अपने सीधे हाथ से चेन खोली और कोशिश करने लगा. मुश्किल से दो चार बूँदें निकलीं.

अंकल की तरफ से जोर से आवाज आ रही थी. उन्होंने मेरे हाथ को झटका दिया. मैंने उनकी तरफ देखा तो उन्होंने मुस्कुराते हुए नीचे की तरफ इशारा किया. उनके लंड से मोटी धार निकाल रही थी. मैंने तुरंत ही अपनी नजर हटा ली.
वाशरूम से बाहर निकलते वक्त अंकल ने अपना हाथ मेरी कमर पर रख दिया और उँगलियों से मेरी पसली दबाने लगे.

सिनेमा हाल में अंदर जाने के दरवाजे खुल गये थे. मैं अंकल के साथ अंदर जाने लगा. अब उनका हाथ मेरी कमर से नीचे था. एक दो बार उन्होंने मेरे कूल्हे पर थपकी भी दी.
अरे वाह!! अंकल के पास तो बालकनी के टिकट थे.

उन्होंने कारीडोर से पोपकोर्न और लिम्का की दो सौ एम एल की बोतल ली. बोतल मेरे हाथ में थमा दी और अंदर चले गये. कॉर्नर वाली सीटें थीं हमारी, जाकर बैठ गये.
अंकल ने मुझे कोने वाली सीट पर बैठाया.
धीरे धीरे टाकीज पूरा भर गया.

अमिताभ बच्चन का दौर था. फिल्म चालू हुई. अंकल ने पोपकोर्न का पैकेट खोला. सीधा हाथ मेरे कंधे पर रख दिया और पोपकोर्न मेरे मुंह के सामने किये. मैंने उसमें से एक दो पोपकोर्न लिए और खाने लगा.
अंकल ने थैली अपनी गोद में रख ली और मुझसे बोले- खाते भी जाओ.
मैं बीच बीच में पोपकोर्न लेते जा रहा था. अंकल का सीधा हाथ अब कंधे से नीचे उतरकर मेरे दायें सीने पर आ गया था.

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