डॉक्टरनी के साथ पहाड़ी पर मस्ती

दोस्तो, मैं अन्तर्वासना का नियमित तो नहीं लेकिन पाठक हूँ और काफी दिनों से हूँ। मैं एक शादीशुदा और चार बच्चों का पिता हूँ। मेरी शादी कम उम्र में ही हो गई थी जब मेरी उम्र 19 साल की होगी।
अब कहानी पर आता हूँ। यह कहानी उन दिनों की हैं जब मैं ग्वालियर में एक दवा कंपनी में काम कर रहा था, मेरी उम्र यही कोई 25 वर्ष होगी, मुझे मेडिकल कॉलेज का काम मिला था। मैं थोड़ा गंभीर, संकोची किस्म का लड़का हूँ। अपने काम की वजह से मुझे काफी डॉक्टरों और रेजिडेंस डॉक्टरों से जान-पहचान हो गई थी।

ग्वालियर में मेरा अपना कोई नहीं था और काम बोलने तथा रिज़र्व रहने के कारण मेरे अपने कार्यक्षेत्र के मित्र कम ही थे इसलिए मैं काम से फुरसत के क्षणों में मेडिकल कॉलेज की तरफ ही चला जाता और कॉलेज कैम्पस क्षेत्र में एक रेस्तराँ था, वहीं शाम को कुछ हल्का और कॉफी या चाय पीता था।

एक दिन की बात है 5’4″ लम्बी लड़की जो एक रेजिडेन्ट डॉक्टर थी, रेस्तराँ में मिली और बोली- यहाँ कैसे?
तो मैं बोला- मैम, मैं अक्सर सप्ताहांत में मैं यहाँ आता हूँ, क्योंकि ग्वालियर में मेरे कोई नहीं है और मैं कोई दोस्त भी नहीं बना पाया हूँ। इसलिए फुरसत के क्षणों में यहीं आ जाता हूँ। मेरा समय भी पास हो जाता है और आप सबों से मेरी मुलाकात हो जाती है।

उसके बाद वे मेरे पास ही टेबल पर बैठ गई तथा एक दूसरे के बारे में बात होने लगी। यह सिलसिला लगभग काफी दिनों तक चला।
लड़की का नाम प्रियंका शेखावत था जो कोटा राजस्थान की रहने वाली थी, आकर्षक व्यक्तित्व की धनी थी।

हम दोनों काफी अच्छे दोस्त बन गए और काफी खुलकर बातें होने लगी थी और हमारे कंपनी के कुछ प्रोडक्ट पुरुष और स्त्री इंफेर्टिलिटी से संबंधित भी थी तो उस पर थोड़ा बातचीत होने लगी।
मेरा सब्जेक्ट साइंस नहीं था तो वो मुझे ह्यूमन एनाटॉमी एंड फीजियोलॉजी के बारे में बताती।

एक दिन शनिवार था, मैं 4:30 के आस-पास मेडिकल कॉलेज के रेस्तराँ में पहुँचा, वो डॉक्टरनी प्रियंका भी पहुँची। थोड़ा समय पास होने बाद मैं वापिस अपने रूम को लौटने के लिए विदा ले रहा था कि बीच में ही टोकते हुए बोली- राज, आज थोड़ा पहाड़ियों के तरफ चलते हैं।
तो मैं बोला- मैम शाम ढलने को है, अभी हम दोनों पहाड़ी पर क्या करेंगे.
तो वो बोली- आज एकांत में बैठने की इच्छा हो रही है, चलो पास के कैंसर अस्पताल के पहाड़ी पर ज्यादा नहीं, थोड़ी देर ही बैठेंगे।

उनके आगे मेरी एक भी न चली और स्कूटर पर बैठ कर चल दिया। आज वो मुझसे चिपक कर बैठी थी, उनके स्तन का अहसास मुझे मेरी पीठ पर हो रहा था।

हम दोनों पहाड़ी पर पहुँचे, देखा कि सूर्य अपनी लालिमा को समेटे अस्त होने को था। चारों तरफ धीरे धीरे अंधेरा बढ़ रहा था। कैंसर अस्पताल के पार्किंग क्षेत्र में स्कूटर पार्क कर अस्पताल के पास पार्क के एक शिला पर हम दोनों बैठ गये।

प्रियंका मेरे काफी करीब बैठी हुई थी, वो मेरे कंधे पर अपना सिर और मेरे एक हाथ को अपने हाथ में लेकर बात करने लगी, बोली- काफी थक गई हूँ, इसलिए सोचा कि तुम्हारे कंधे पर अपना सर रखकर थोड़ा आराम कर लूं, इस लिए तुझे लेकर यहाँ आ गई।

मैं उनके बालों को एक हाथ से सहलाने लगा। मेरे जीवन में पत्नी के बाद प्रियंका पहली लड़की थी जो मेरे इतने समीप बैठी थी। मेरी तो हालात भी खराब हो रही थी। लिंग में धीरे धीरे तनाव और दिल बेईमान हो रहा था।
लगभग 45 मिनट बीत जाने के बाद मैं बोला- अब हमें चलना चाहिए क्योंकि काफी अंधेरा हो रहा है।
प्रियंका बोली- यार, अभी दिल भरा नहीं!

लेकिन मैं तो अपने आप को नियंत्रित नहीं कर पा रहा था।

इन सारी बातों के बीच मैं एक बात आपको बताना भूल ही गया कि प्रियंका की बनावट 32-30-32 थी, साथ दूधिया गोरी, काली आँखें और भूरे बाल… बड़ी ही कयामत दिखती थी। कोई भी उसे देख कर आहें भरने लगता था।

मैं बोला- प्रियंका, आखिर तुम चाहती क्या हो? कब तक हम यों यहाँ पड़े रहेंगे।
मैंने घड़ी देखी तो सात बजने को थी।

मैं जैसे ही उठने को हुआ, उनका एक हाथ मेरी जीन्स के ऊपर से ही मेरे कड़क लिंग पर आया और उन्होंने तुरंत मेरे लिंग को ऊपर से ही पकड़ लिया, बोली- ये क्या? तुम तो बड़े ही छुपे रूस्तम निकले यार! मुझे चोदने की मन ही मन इच्छा रखते हो और मुझे भनक तक भी नहीं है।
वो उठी और मेरे तरफ चेहरा करके सामने की बैठ गई और मेरे जीन्स की बटन खोलकर लिंग को बाहर निकाल लिया और लिंग की चमड़ी को ऊपर नीचे करने लगीं.

मुझे अब खुद पर नियंत्रण करना मुश्किल हो रहा था, मैं बोला- तुम्हें पता होगा कि मैं शादीशुदा हूँ. फिर यह काम गलत है.
मैंने अपने लिंग को छुड़ाने के असफल प्रयास किया, तब तक प्रियंका मेरे लिंग को अपने मुँह में लेकर चूसने लगी।

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