हमने नया गाँव बसा लिया

बात 1942 के आसपास की है। हम 15 लड़कों ने अंग्रेजों के एक काफिले को लूटा. उसमें 20 जवान लड़कियां भी थी जिन्हें अंग्रेज जबरन ले जा रहे थे. उसके बाद कैसे गाँव बस गया?

हैलो मेरे नवयुवक दोस्तो और सहेलियो,
आप सब कैसे हो?
आशा है आप सब सर्दी के मौसम में चुदाई का मजा ले रहे होंगे, अथवा किसी बढ़िया से लन्ड या चूत का ख्वाब देख रहे होंगे।

आज मैं आपको बहुत ही अच्छी से अपनी चुदाई कहानी सुनाऊंगा, जिसमें हमने कैसे चुदाई के मजे लिये।

बात बहुत पुरानी है, उस समय न तो आज की तरह टेलीविजन होता था, न ही इंटरनेट।
हाँ, कुछ बड़े शहरों में सिनेमाघर थे, उसमें केवल ब्लैक एंड व्हाइट मूक फिल्में ही चला करती थीं।

यह बात 1942 के आसपास की है। उस समय भारत छोड़ो आंदोलन की शुरुआत हो रही थी। अंग्रेजी वस्त्रों व वस्तुओं की होली जलाई जा रही थी। देश का बच्चा बच्चा देश की आजादी में शामिल होना चाहता था।
हम लोग भी देश की आजादी के लिये अपना अपना योगदान दे रहे थे।

तो दोस्तो, आपको पता ही होगा कि अंग्रेजों का देश पर शासन था, वे आंदोलन को दबाने के लिये हर हथकंडा अपनाते थे।

अंग्रेज अफसर व उनकी सेना में भर्ती भारतीय सैनिक भी बहुत जुल्म ढाते थे। वो लोग हमारे गांवों में घुसकर उत्पात मचाते थे, हमारे पशुओं व मुर्गी बत्तख आदि छीन लेते थे, व अनाज भी हथिया लेते थे।

हम लोगों के दल में 15 युवक थे। हम लोगों का काम था कि हम स्वतंत्रता आंदोलन के लिये लोगों को जागरूक करते थे, कभी कभार अंग्रेजी सेना से हम लोगों की छुटपुट मुठभेड़ भी हो जाती थी, लेकिन हम लोग कभी उनके हाथ नहीं लगे।

एक दिन हमको खबर मिली कि कुछ अंग्रेज अफ़सर कोई बड़ा खजाना लेकर कानपुर से झांसी किले की ओर जाने वाले हैं।
यह हम लोगों के लिये बहुत ही शानदार खबर थी, हम लोगों ने सोचा कि यदि यह खजाना हम लोग अंग्रेजों से छीन लें तो, हम अपने संगठन को और मजबूत कर सकते हैं।

हमारा गांव उरई जिले में पड़ता था, जो कानपुर व झांसी की बीच में ही था। उस समय तक आवागमन के लिये कोई बहुत अच्छे रास्ते नहीं थे, और लंबे सफर में खाने पीने की व्यवस्था गांवों से ही हो पाती थी।

ये अंग्रेज भी बड़े चोदू किस्म के लोग होते थे, तो ये रास्ते में पड़ने वाले गांवों में ठहरते, और गांव की कच्ची कलियों को मसलने के लिये हरदम बैचेन रहते थे।

इनका मन करता तो वो गांव की लड़कियों को पकड़कर छावनी में ले जाते जिन्हें खूब चोदने के बाद या तो वापस कर देते, या फिर अपने बंगलों की नौकरानी बना लेते थे। जो लड़कियाँ इनके हाथ लगती थी, उनमें से अधिकतर वापस नहीं आती थीं क्योंकि 15 20 दिन अंग्रेजों से चुदने के बाद उनसे शादी कौन करता?

कई शादीशुदा औरतें भी अंग्रेज ले जाते थे, वो भी कभी कभार ही अपने परिवार में वापस लौट पाती थीं क्योंकि अंग्रेज उनकी भी चूत का भोसड़ा बना देते थे।

तो हम कहानी पर आते हैं कि हमको सूचना मिली कि अंग्रेज खजाना लेकर निकल रहे हैं।

हम लोगों ने इसके लिये एक योजना बनाई कि कैसे इनसे खजाना छीन लिया जाये।
हमने उन अंग्रेजों का इंतजार करना उचित समझा क्योंकि हम लोगों के पास न तो घोड़े थे, न ही सबके पास साइकिलें थीं और जंगल में साइकिल भगाना सम्भव भी नहीं था।

तो चार दिन बाद सूचना मिली कि वे लोग 10 कोस दूर गांव में ठहरे हैं, अगले दिन वो हमारे गांव के पास से निकल सकते हैं।

अब वो दिन भी आ गया ये 15 नवम्बर 1942 की बात है।

हम लोग जंगल के रास्ते उनके आने की प्रतीक्षा करने लगे, हम सब के पास चाकू तलवार व तेल पिलाये हुये लट्ठ थे।

असल में हमने कभी कोई ऐसा काम नहीं किया था तो हमको ज्यादा अनुभव भी नहीं था.

हम लोगों ने दूर से देखा कि उनका काफ़िला चला आ रहा है, वो सब अपनी अपनी चुस्त वर्दियों में काफी तगड़े लग रहे थे।

हमने देखा कि एक अंग्रेज अफ़सर अपने घोड़े पर बैठा सबसे आगे चल रहा था, उसकी पिस्तौल उसकी कमर पर चमक रही थी, उसके पीछे तीन घुड़सवार अंग्रेज बन्दूक लेकर चल रहे थे, उसके पीछे तीन घोड़ागाड़ी चल रहीं थी।

पहली घोड़ागाड़ी में चार घोड़े जुते थे, और यह घोड़ागाड़ी एक कमरे नुमा थी, जिसकी चौड़ाई करीब छह फुट लंबाई करीब दस फुट व ऊंचाई पाँच फुट से ज्यादा थी, उसके दोनों ओर खिड़कियाँ भी बनी हुई थीं जो उस समय बन्द थीं।

पीछे वाली दो घोड़ागाड़ियाँ खुली हुईं थीं, उसमें बोरियों में खाने पीने का सामान, व टेंट लगाने का सामान था।

इन घोड़ागाड़ियों के पीछे तीन अंग्रेज अपने अपने घोड़ों पर सवार थे, और उनके कंधे पर राइफलें लटक रहीं थी।

इनके पीछे करीब बारह भारतीय सैनिक तलवारों से लैस पीछे पीछे पैदल ही चल रहे थे, उनके बूटों की कड़क आवाज जंगल में गूंज रही थी।

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