हमने नया गाँव बसा लिया

उनमें से अधिकतर ने यही कहा- घर वाले तो हमें स्वीकार करेंगे नही, हमें अंग्रेजों के पास ही छोड़ दो. दिन में पाँच दस बार चोद लेंगे तो कम से कम खाना तो मिल जायेगा।
वो सब हम लोगों के ऊपर बोझ बनना नहीं चाहती थीं।

हम सभी क्रांतिकारी वीर थे, ऐसी सुंदर कन्याओं को हम अंग्रेजों को कैसे सौंप देते और ऐसे में हमें पकड़े जाने का भी डर था।
तब हमने उन लड़कियों से कहा- हम तुम्हारी जिम्मेदारी को उठाने को तैयार हैं।
तब तक लड़कियों का डर लगभग खत्म हो गया था। अब वो खुलकर हँस हँस कर हम लोगों से बातें करने लगीं।

अब उनकी जिम्मेदारी तो उठा ली, लेकिन न हम अपने गाँव जा सकते थे, न ही कहीं और ही … क्योंकि समाज में आते ही अंग्रेज हम लोगों को हिरासत में ले सकते थे।

हमारे पास पर्याप्त हथियार, सोना, और साठ पैसठ आटा चावल की बोरियां थीं जिससे हम 35 लोग साल दो साल भर तो मजे से काट सकते थे।

तो हमने घने जंगल में ही साफ सफाई करके रहने का फैसला किया। पाँच लोगों को कुछ बर्तन व औजार, दूर के किसी गांव से खरीद लाने को भेज दिया, और कह दिया कि एक व्यक्ति उस गाँव के बाहर ही घोड़ों के साथ ही रुक जायेगा, बाकी चार पैदल ही गाँव में जाकर खरीददारी करेंगे।

तो दोस्तो, इस तरह से हम दस साथी व 20 सुंदरियाँ वहीं रुक गये। तब तक लड़कियाँ पूरी तरह से बेफिक्र हो चुकी थीं, और वे अपने आगामी जीवन का सोचने लगी थीं।

तभी उनमें से एक लड़की ने कहा- हम लोगों की जिम्मेदारी आप लोगों ने ले ली है तो हमारा भी आप लोगों के प्रति फर्ज बन जाता है। आप लोग जब चाहें, जैसे चाहें, उपयोग कर सकते हो. अब हमारा तन मन आप लोगों को समर्पित रहेगा।

लेकिन एक दुविधा हो गयी कि हम 15 साथी थे और लड़कियाँ 20 थीं। हमारे दल के प्रत्येक साथी का उनको बचाने में योगदान भी था, तो बंटवारा कैसे किया जाये।

उनमें से एक लड़की ने सुझाव दिया- अंग्रेजों के पास जाते तो पता नहीं कौन कौन कितनी बार चोदता, कितने लोगों से चुद जाते, तो यहाँ हम अपनी इच्छा से तुम 15 लोगों को अपना शरीर दे रही हैं. इससे बंटवारा भी नहीं करना होगा और सबका अहसान भी पूरा हो जायेगा।

उसकी इस बात का समर्थन सभी हुस्न की मलिकाओं ने किया.

लेकिन हमें भी सभी साथियों की राय लेना जरूरी था। तो मैंने कहा कि हमें सबके वापस आने तक रुकना चाहिये।

शाम तक हमारे साथी वापस लौटे. तब तक हम लोगों ने जंगल से सूखी लकड़ियां इकट्ठा की और पत्थरों से चूल्हा तैयार किया। उनके आने पर लड़कियों ने खाना बनाने की तैयारी शुरू की और हम सभी साथी झोपड़ी बनाने के लिये लकड़ियां काटने लग गये.

दो घण्टे में ही खाना बन गया और हमनें भी पर्याप्त लकड़ियों को काट लिया और जमीन भी साफ कर ली।

हम लोगों को बड़ी तेज भूख लगी थी. सब लोगों ने साथ साथ खाना खाया और अपने सभी साथियों को दोपहर वाली बात बताई।
सब लोगों को बात पसंद आ गयी।

अब पेट भरने के बाद सबको कार्यक्रम आगे बढ़ाने की इच्छा जाग गयी। जल्दी जल्दी हम लोगों ने आसपास के पेड़ों पर रस्सियों के सहारे तिरपाल बांधे, और सूखी पत्तियों को बटोर कर गुलगुला बिस्तर बनाया, उस पर बड़ी दरी बिछाई गई।

सबको कम्बल दिये गये, कम्बल ओढ़ कर कुछ गर्मी मिलना शुरू हुई, तो हम लोगों ने अपने अपने अरमान पूरे करने को मन ही मन तैयार कर लिया।

आज हम 35 लोग एक साथ अपनी सुहागरात मनाने जा रहे थे, तो मन में बहुत प्यारी सी गुदगुदी होने लगी।

मैंने अपनी बगल वाली छमियाँ को अपने पास खींचा और अपने प्यासे होंठ उसके गुलाबी होठों पर लगा दिये. एक दूसरी लड़की ने मुझे पीछे से जकड़ लिया और मेरे सीने पर हाथ फिराने लगी. मेरी गर्दन पर चुम्मियाँ लेने के साथ पीठ पर अपनी चूचियाँ रगड़ने लगी।

मैंने बगल में देखा कि सभी साथी किसी न किसी के मुँह में मुँह डाल कर एक दूसरे की जीभ चूस रहे थे। चार लड़कियां भी आपस में एक दूसरे की चूचियाँ मसल रहीं थी।
आधे घण्टे तक यही सब चलता रहा.

फिर हमने अपने टेंट में चार मिट्टी के तेल की ढिबरी जला दीं, जिससे कुछ रोशनी हो जाये।
फिर हमने आपस में लड़कियों को अदल बदल के चूमा चाटी शुरू कर दी।

उस टेंट में से सिसकारियों की आवाजें गूंजने लगीं। थोड़ी देर में टेंट के अंदर भयंकर तूफान आ गया, सभी लड़कियों के सारे कपड़े उतार कर नंगी किया गया। कोई किसी की चूचियाँ पी रहा था, कोई किसी की चूत का अमृत चाट रहा था।

फिर हम साथियों ने भी अपने अपने कपड़े उतार फेंके. अब 15 दूल्हे और 20 दुल्हनें एक साथ अपनी सामूहिक सुहागरात मना रहे थे।
मैंने रेशमा की चूत में अपनी जुबान लगाई हुई थी और फातिमा मेरे लन्ड को चूस रही थी, आयशा मेरी गांड के छेद में अपनी जुबान घुसा रही थी।

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