पुस्तक प्रेम से यौन आनन्द तक

पहली बार अन्तर्वासना के मंच पर अपनी आपबीती लिख रहा हूँ। लिखावट में यदि भूल रह गयी हो तो आपका क्षमाप्रार्थी हूँ।
हाँ तो दोस्तो, मैं प्रतीक, अहमदाबाद से … 24 साल की आयु, 5’11” की ऊंचाई और रंग गोरा है। स्वभाव थोड़ा शर्मीला है और स्कूल टाइम से ही चोकलटीबॉय की छाप रही है। रीडिंग का शौक मुझे पहले से ही है। और इसीलिए हर वक्त बैग में कुछ हो न हो एक नॉवेल तो होती ही है।

बात कुछ 5 साल पुरानी है जब मैं इंजीनियरिंग के पांचवें सेमेस्टर में था। कॉलेज बाइक से जाया करता था और बाइक कॉलेज के पार्किंग में रखकर दिनभर सीटी बस मैं ही घूमता और पुस्तक पढ़ता। यही लगभग रोज़ का नियम था मेरा।

वैसे कॉलेज में कुछ लड़कियां फ़िदा थी बन्दे पर … लेकिन कभी लड़कियों में दिलचस्पी लेने की कोशिश तक नहीं की थी और न तो मुझे लड़कियों को देखकर शरीर में कभी उत्तेजना महसूस होती। जिंदगी बस मेरे और मेरी पुस्तकों के बीच ही सिमटी पड़ी थी।

उस दिन भी बाइक पार्किंग में लगाके यूनिवर्सिटी स्टैंड से 50 नं की बस पकड़ी … पूरा ध्यान पुस्तक में लगाए पढ़ रहा था। तभी एक आवाज़ कानों में टकराई- एक्सक्यूज़ मी, आप अपना बैग ले लीजिए। मुझे बैठना है यहां!
देखा तो एक लड़की खड़ी थी, 5’6″ की ऊंचाई, मध्यम बदन, बड़ी बड़ी काली आँखों को छोड़ उसका पूरा चेहरा स्कार्फ से ढका हुआ… लेकिन उसके हाथों का रंग उसके गोरे होने का सबूत था।

मैंने बैग हटाकर बाजु वाली सीट पर जगह कर दी और फिर से पढ़ना चालू कर दिया। बीच-बीच में उसकी ओर ध्यान जाता तो हर बार उसे मेरी किताब में ताकते देखा।
और उसका स्टैंड आते ही वो चली गयी।

दो दिन बाद फिर से उसी बस में हमारी मुलाकात हो गयी। आज भी वो बाजू की सीट में आकर बैठी और मेरी पुस्तक में ही ताक रही थी। पर इसकी वजह से मुझे पढ़ाई में थोड़ी असहजता महसूस हो रही थी। ध्यान ठीक से नहीं लगा पा रहा था। पर जैसे तैसे पढ़ना जारी रखा और फिर स्टैंड आते ही वो चली गई।

अगले दिन फिर पिछले दिन का ही पुनरावर्तन हो रहा था और मेरा ध्यान पुस्तक से बिल्कुल गायब हो गया था। सारा ध्यान अब इस असमंजस में था कि अब इससे बात करूँ या ना करूँ और करूँ तो चालू कहाँ से की जाये?
तभी पता नहीं क्या सोचकर उसकी तरफ देखते हुए पुस्तक उसकी ओर बढ़ाई और कहा- पढ़नी है? ले लो इसे!
मेरी इस तरह की प्रतिक्रिया की उसे शायद अपेक्षा नहीं थी, स्तब्ध सी बैठी उधेड़बुन में कभी मुझे देखती तो कभी पुस्तक को। “आप पहले खत्म कर लो फिर देना।” थोड़ा सोच विचार करके बोली।

“मैंने एक बार तो पढ़ी है अगर पढ़नी हो ले जाओ, फिर वापिस कर देना।” मैंने कहा.
“ठीक है, पर अगले हफ्ते से मेरे एग्जाम चालू हो रहे हैं और उसके बाद 10 दिन का मिड वेकेशन है। उसके बाद वापिस करूँ तो कोई दिक्कत तो नहीं है ना?”
“एक काम करो, जब वापिस करनी हो तब मुझे इस नंबर पे कॉल करके बता देना!” और कहते हुए अपना नंबर पुस्तक के पीछे लिख दिया।

तभी उसका स्टैंड आया तो वो जल्दी से चली गयी और मेरे पास भी पढ़ने को कुछ था नहीं तो वापिस कॉलेज आ गया और दो लेक्चर पढ़े और घर चला गया।

उस दिन रात को खाने के बाद लेटा हुआ फोन में गेम खेल रहा था, तभी व्हाट्सएप्प पर अनजान नंबर से मैसेज आया- ‘हाय’
मैं – हाय, कौन?
“मैं शलाका, जिसे आपने आज किताब दी वो… दरअसल जल्दी में थैंक्स कहना ही भूल गयी… तो थैंक यू वैरी मच।”
उसने फिर पूछा- वैसे आपका नाम?

मैंने फिर अपना नाम बताया और मैसेज में ही रात के 11 बजे तक एक दूसरे की रस-रूचि बारे में सामान्य बातें होती रही।

दूसरे दिन फिर बस में मिल गयी और बातचीत हुई। पर उसका चेहरा अभी भी जिज्ञासा का विषय था मेरे लिए … क्योंकि जितनी बार मिली थी, हर बार चेहरा स्कार्फ से ढका होता था।

उस दिन बाद उसके एग्जाम चालू हो गए तो वो अपने एक्टिवा से कॉलेज आती जाती। पर व्हाट्सएप्प पर रात को हर रोज बातें हो जाती। धीरे धीरे हमारी बातें आगे बढ़ने लगी और अब तो पूरा खुल के बातचीत का दौर चलता। द्विअर्थी एवं अश्लील चुटकुले और बातों का आदान प्रदान भी हो जाता।

आखिर पुस्तक खत्म हुई तो मैंने यूनिवर्सिटी के पीछे वाले एक कैफ़े पर देने को बुलाया। दूसरे दिन 2 बजे आने के लिए उसने हाँ की और शुभरात्रि के साथ बात खत्म हुई।

दूसरे दिन के इंतज़ार में नींद मानो आंखों से गायब ही हो चुकी थी। कल उसका चेहरा देखने मिलेगा या नहीं? अगर देखने को मिला भी तो वो कैसा होगा? ऐसी तरह तरह की ख्याली बातें सोचते सोचते कब देर रात आँख लगी पता ही नहीं चला।

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