अंकल की बेटी की गर्म चूत

प्रिय दोस्तो, मैं रसिया बालम एक बार फिर हाजिर हूं आपकी खिदमत में!
दोस्तो, जवानी भी बहुत बुरी चीज है, हर किसी का ईमान डिगा देती है या फिर मैं यह कहूं कि जवानी पर किसी का जोर नहीं है। मेरी यह नई कहानी एक इसी बात का नमूना है।

बात उस समय की है जब मैं आगरा अपनी ग्रेजुएशन की पढ़ाई करने के लिए पहुंचा। जब मैं आगरा पहुंचा तो वहां पर मेरे रहने की व्यवस्था पहले से ही थी। मेरे पिताजी के एक मित्र आगरा में रहते थे और उन्हीं ने अपने यहां पर नीचे एक कमरा मेरे लिए व्यवस्थित करा दिया था। वो फस्ट फ्लोर पर रहते थे। वह कमरा तो सिर्फ मेरे लिए एक नाम मात्र का था क्योंकि अंकल और आंटी मुझे अपने परिवार का एक सदस्य के रूप में मानते थे। मेरे लिए किसी भी चीज की कोई रोक-टोक नहीं थी। मैं उनके बाथरूम से लेकर बेडरूम तक सभी चीजें उपयोग में लेता था। मतलब कि नीचे का कमरा मेरे लिए एक स्टडी रूम की तरह था।

मकान मालिक के परिवार में मियां बीवी और दो बेटे और दो बेटियां थी। बड़ी बेटी की शादी हो गई थी। बड़े बेटे का नाम विकास छोटे का नाम आकाश, बड़ी बेटी का नाम शीला और छोटी बेटी का नाम रश्मि था। विकास चेन्नई में जॉब करता था और रश्मि ने इसी वर्ष बी एस सी के लिए गाजियाबाद में एडमिशन लिया था और छोटा बेटा घर पर ही रहता था।

उनकी छोटी बेटी रश्मि मेरी हम उम्र थी। दिखने में एकदम आकर्षक थी… लम्बाई 5’7″ शरीर एकदम स्लिम… गोल चेहरा… कजरारी आंखें मतलब कोई उसे देखकर दीवाना हो जाए। हम दोनों एक दूसरे को पहले से जानते थे क्योंकि वह मेरे पिताजी के मित्र की बेटी थी। हम लोग घंटों एक दूसरे से बातें करते रहते थे। कभी वह मेरे रूम में आ जाती थी और कभी मैं उसके बेडरूम में चला जाता था, परंतु ना तो कभी मेरे मन में गलत विचार आये और नहीं कभी किसी को आपत्ति हुई।

मेरे आगरा पहुंचने के करीब 6 महीने बाद दिसंबर के महीने में बड़े बेटे की शादी हुई। शादी के बाद नई बहू घर में आई परंतु रश्मि के फर्स्ट सेमेस्टर के एग्जाम होने की वजह से उसे शादी के तुरंत बाद गाजियाबाद जाना पड़ा। मेरा भी ऊपर जाना कम हो गया क्योंकि मुझे नई भाभी के सामने जाने में शर्म लगती थी।

एक दिन अंकल ने मुझे ऊपर बुला कर पूछा- क्या बात है आजकल तुम दिखाई नहीं दे रहे हो? कोई परेशानी तो नहीं है?
तो मैंने कहा- ऐसी कोई बात नहीं है अंकल, नई भाभी आई हैं तो कहीं मेरे बार-बार ऊपर आने से उन्हें अनकंफर्टेबल फील हो।
यह बात सुनकर अंकल ने मुझ में डांट लगाई और कहा- तुम भी इस घर के एक सदस्य हो!
और उन्होंने नई भाभी अंजू को आवाज़ लगाई और मेरा परिचय करवाया कि यह भी इस घर का सदस्य है।

इसके बाद मेरा ऊपर आना एक मजबूरी बन गया। अब मैं कॉलेज से आने के बाद और शाम को ऊपर जाने लगा। धीरे धीरे मेरी भाभी से बात होने लगी। उनका स्वभाव भी बहुत अच्छा था और उनके साथ जल्द ही घुल मिल गया।
उधर दो हफ्ते बाद रश्मि के एग्जाम खत्म हो गए और वह भी वापस आगरा आ गई।

कुछ दिन बाद एक दिन मैं अपने रूम में बैठकर पढ़ाई कर रहा था तभी रश्मि अपनी बुक्स लेकर नीचे मेरे रूम में आ गई और बोली- मैं भी यहीं बैठ कर स्टडी करूंगी क्योंकि ऊपर ज्यादा डिस्टर्ब होता है।
मैंने ऐसे ही उससे पूछ लिया- ऊपर डिस्टर्ब क्यों होता है?
तो उसने मुझे अजीब से नजरों से देखा।

मैं कुछ समझ नहीं पाया तो मैंने उससे दोबारा पूछा- ऐसे क्यों रिएक्ट कर रही हो?
तो उसने कहा- नई भाभी को भी एकान्त चाहिए।
मैंने पूछा- उन्हें एकांत की क्या जरूरत है?
तो उसने कहा- भैया की 3 दिन की छुट्टी बची है इसलिए उन्हें एकांत की जरूरत है।

यह सुनकर मुझे हंसी आ गयी परंतु मैं मुस्कराकर रह गया। मेरी मुस्कुराहट से वह शरमा गई तो मैंने उससे शरारती अंदाज में पूछा- वे एकांत में क्या करेंगे?
यह सुनकर वह बुरी तरह से शर्मा गई और अपनी किताब लेकर ऊपर भाग गई।

मेरे और उसके बीच में इस तरह की घटना पहली बार हुई थी। मैं समझ नहीं पाया कि वह क्यों भाग गई। मैं वापस अपनी पढ़ाई में व्यस्त हो गया।

शाम को जब मैं ऊपर गया तो वह मुझे देख कर मुस्करायी और वहां से चली गई। यह मुझे कुछ अजीब लगा और मैं भी अपने कमरे में नीचे आकर लेट गया। थोड़ी देर बाद रश्मि नीचे आई और बोली- तुम वापस क्यों चले आये?
तो मैंने उससे पूछा- तुम मेरे आने के बाद वहां से क्यों चली गई थी?
उसने कहा- ऐसी कोई बात नहीं थी.

मैंने उससे पूछा- तुम दोपहर में जब स्टडी करने नीचे आई थी तो ऊपर क्यों चली गई थी?
यह सवाल सुनकर वह शरमा गई और ऊपर जाने लगी परंतु मैंने उसे पकड़ कर बैठा दिया।
वह बोली- तुमने बात ही ऐसी पूछी थी।
मैंने कहा- तो इसमें भागने की क्या जरूरत थी… हर मियां बीवी यह काम करते हैं।
यह सुनकर वह बोली- तुम बहुत बदतमीज हो गए हो!
और ऊपर चली गई।

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